Maddi Ka Vaachik Sahitya
2017104 pagesHindi
About the book
भारत की भाषायी-सम्पदा, लोक के बहुलतावादी-यथार्थ को आत्मसात् किये हुये है। इस लोक की मिल्कीयत का संकलन और परिरक्षण आवश्यक है। प्रत्येक भाषा में जीवन को देखने का विश्व-बोध अंतर्निहित होता है।‘माड़’ अंचल में बोली जाने वाली भाषा को ‘माड़-भाषा’ या ‘माड़ी’ के नाम से जाना जाता है।‘माड़’ का अर्थ है- ‘मड़’/ ‘गारा’या ‘काली मिट्टी’ का क्षेत्र। यह शब्द स्थान विशेष से संबध्द होकर राग-विशेष का वाचक बन गया। यह पूर्वी राजस्थान के सवाई माधोपुर, करौली जिलों की बामनवास, गंगापुर सिटी, नादौती और सपोटरा (कुछ हिस्सा) आदि तहसीलों की भाषा है।‘माड़ी’ का वाचिक साहित्य पर्याप्त समृध्द है। इसके लोक-कलात्मक रूप हैं- ‘रामजी के गीत’, ‘कन्हैया’, ‘रसिया’, ‘हेला-ख्याल’, ‘पद’, ‘सुड्डा’, ‘ढाँचा’, ‘जोगियों के गीत’, ‘ग्याड़’, ‘माँडणे’, और ‘कुदकन्ना’। आज यह भाषा संकटग्रस्त है।‘माड़ी’ लोक-जीवन के संवाद की भाषा है।‘माड़ी’ लोक-भाषा साम्प्रदायिक, धार्मिक नस्लीय भेदभावों से ऊपर ‘सामासिक-संस्कृति’ का निर्माण करती है।
-डॉ. भीमसिंह
Editions
| Format | ISBN | Price | |
|---|---|---|---|
| Paperback | 9789386722676 | ₹300 |
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