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Cover of Samkaleen Hindi Kavitha

Paperback₹560

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Samkaleen Hindi Kavitha

by Sumit P. V. and Rakesh Kumar Singh

2016202 pages

About the book

कविता हमेशा से युगीन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में कवि के रचनात्मक व्यक्तित्व को रूपायित करने का माध्यम रही है; और अब भी है। अपने समय की बारीक, जटिल और अंतर्विरोधों से संपृक्त सच्चाइयों को अभिव्यक्त करने की शक्ति हर रचनात्मक रूप से परिपक्व कवि में रहती है; जो सामान्य तौर पर कवि और उसकी रचना प्रक्रिया को समकालीनता के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित भी करती है। इस वजह से कविता को अपने समय के सबसे समर्थ और सतर्क नागरिक के तौर पर महसूस किया जा सकता है। समय की पल-प्रतिपल की परिवर्तनशीलता की वाजिब सच्चाई और उसके साथ ‘समकालीन’ जैसे पद का विशेषण के रूप में प्रयोग हमेशा हमारे सामने अर्थगत संकट का कारण बनता है। कभी लगता है यह समय का द्योतक है तो कभी मूल्य का या मूल्य के प्रति दृष्टि विशेष का। जो भी है, समकालीन कविता के संदर्भ में इनको अर्थगत संगति प्रदान करना बिल्कुल भी नाजायज नहीं लगता। समकालीन कविता या दूसरे शब्दों में कहें तो कविता का समकालीन इलाका रूढ़ और प्रतिगामी आदर्शों की महत्वहीनता के कोने-कोने पर अपनी असहमति की कलम तोड़ना नजर आता है। लेकिन उसके पुनर्निर्माण या प्रतिस्थापन में वह कितनी कारगर है ये बात समकालीन कविता के वैचारिक स्वरूप पर संकलित आलोचनात्मक आलेख ही देंगे। हिंदी कविता निरंतर गतिशील है, उसकी गति को रोकना इंटरनेट या ब्लॉग के इस दौर में संभव नहीं है। जाहिर सी बात है कि इंटरनेट का आविष्कार कविता की लोकप्रियता को बढ़ाने में सहायक बन गया है। आम तौर पर इस किताब में 20वीं सदी के अंतिम दशक से लेकर 21वीं सदी के अब तक के बीते वर्षों में हिंदी कविता की आंतरिक और बाह्य संरचना व स्वभाव को प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है।

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Paperback9789352073580₹560Amazon

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